धोबी का कुत्ता न घर का ना घाट का-

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धोबी का कुत्ता न घर का ना घाट का -

इस कहावत का उदय कई सालों पहले हमारे पूर्वजों ने किया था लेकिन अगर हम बात करे आज के राजनीतिक व्यक्तित्व की तो ये कहावत आज की तारीख में शत्रुध्न सिन्हा के ऊपर एकदम फिट बैठती है क्योंकि 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को भारी बहुमत मिलने के बाद से बीजेपी नेताओं की आशाएँ काफी बढ़ा गयी थी जिनमे से कुछ ऐसे नेता भी थे जिनको ये लगने लगा था की उनकी लोकप्रियता के हिसाब से उन्हे केंद्र सरकार में कोई न कोई मंत्री पद जरूर मिलेगा । लेकिन ऐसा नहीं हुआ ऐसा सोचने वाले नेताओं की लिस्ट में सबसे पहला नाम शत्रुध्न सिन्हा का था। लेकिन बीजेपी ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उन्हे लगा शायद बीजेपी राज्य के होने वाले विधानसभा चुनावों में उन्हे स्टार प्रचारक के तौर पर पेश करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ लेकिन शत्रुध्न सिन्हा की उम्मीद अभी भी बीजेपी से थी की शायद उनके होम स्टेट बिहार में उनकी रैलियाँ कारवाई जाएँ। उनको भी जावा दिखाने का एक मौका मिले, लेकिन ऐसा नहीं हुआ ।

शत्रुध्न सिन्हा ने कई मौकों पर बीजेपी को जमकर कोसा और जेडीयू के साथ आने को बेताब हुये लेकिन नितीश कुमार ने उन्हे चारा नहीं डाला लालू और नितीश ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा और सत्ता में आए । फिर बिहार का ये गठबंधन टूटा और जेडीयू और बीजेपी ने गठबंधन कर सरकार बनाई नितीश कुमार दुबारा सीएम बने। लेकिन शत्रुध्न सिन्हा के सपने एक बार फिर टूट चुके थे। उन्हे लगा शायद लालू यादव ही उनके राजनीतिक करियर की नैया संवार दें तभी तो सिन्हा जी लालू यादव के तलवे चाटने में लगे हुये थे ;लेकिन चारा घोटाले में लालू भी जेल चले गए । और इसी तरह शत्रुध्न सिन्हा की आकांछाएँ पूरी न हो सकी और उनका राजनीतिक करियर भी गटर में जा चुका है और शत्रुध्न सिन्हा जी दुबारा से मुंबई जा रहे हैं ।

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